युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा
मिशन

विश्व बंधुत्व और विश्व शांति की स्थापना के साथ मानव जीवन का कल्याण।

यह मिशन, विश्व बन्धुत्व और विश्व शांति की स्थापना के उद्देश्य से, भैया श्री नन्दकिशोर जी शारदा प्रदत्त दैवीय नवीन ज्ञान के माध्यम से मानव की आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने के प्रति समर्पित है और भैया द्वारा प्रतिपादित बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति के माध्यम से व्यक्ति को सत्कर्म व आराधना के द्वारा अपने आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होने के लिये प्रेरित करता है।

मिशन का उद्देश्य एवं परिचय

मिशन का उद्देश्य एवं परिचय
साधना से प्रकट हुआ मानव कल्याण का सार्वभौमिक मार्ग

जगतजननी माँ त्रिपुरसुन्दरी एवं भगवान शिव (बाबूजी) ने मानव कल्याण हेतु एक विशेष मिशन के अन्तर्गत अपने लाडले पुत्र युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा (भैया जी) को इस धरा पर अवतरित किया।

भैया जी ने पूर्ण समर्पित भाव से अपनी सच्ची लगन, दृढ़ संकल्प, कठोर साधना, अथक परिश्रम एवं निश्छल प्रेम के द्वारा जगतजननी माँ को प्रसन्न कर उनके साक्षात् दर्शन प्राप्त किये तथा ’माँ’ को ही गुरु बनाकर उनसे सत्य, शाश्वत, सार्वभौमिक, विज्ञान-आधारित दिव्य ज्ञान की प्राप्ति की। उन्होेंने इस अलौकिक ज्ञान को अपनी कालजयी कृति ‘मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ के माध्यम से मानवता को समर्पित किया। उन्होंने आधुनिक वैज्ञानिक युग के अनुरूप ज्ञान, भक्ति, निष्काम कर्म एवं योग साधना का समन्वय करके ‘बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति’ का प्रतिपादन किया जिससे व्यक्ति आनन्द, शांति, खुशी, प्रेम से जीवन जीते हुए अपने मानव जीवन का कल्याण कर सके।

भैया जी के मार्गदर्शन में सुश्री बसन्ती जी मनिहार एवं सुश्री मधुबाला जी अडवानी (मधु माँ) सहित अनेक साधकों का आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त हुआ तथा ’मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ की स्थापना हुई।

’माँ’ की आज्ञा से भैया जी ने निष्काम-कर्म साधना के अंतर्गत शिक्षा, संस्कार, छात्रवृत्ति, महिला सशक्तिकरण जैसे लोककल्याणकारी प्रकल्प प्रारम्भ किए। उनके चैतन्यस्वरूप होने के पश्चात् माँ बसन्ती मनिहार ने उनकी प्रेरणा से सद्साहित्य के प्रकाशन-निःशुल्क वितरण एवं मानवीय सेवा के कई कार्य आगे बढ़ाए, जिन सभी का कुशल संचालन आज मधु माँ कर रहीं है। उनके मार्गदर्शन में ’मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ विश्व-बन्धुत्व, विश्व-शान्ति एवं मानव कल्याण हेतु निरन्तर समर्पित भाव से कार्यरत है।

युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर जी शारदा

युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा (भैया जी)

श्री नन्दकिशोर जी शारदा (भैया जी) का जन्म 16 जुलाई 1944 को जोधपुर (राजस्थान) में एक सम्पन्न व भक्तिमय परिवार में हुआ। वे विज्ञान के मेधावी छात्र थे और विलक्षण बुद्धि व तेजस्वी व्यक्तित्व के स्वामी थे।

मात्र 15 वर्ष की अल्पायु में, अपने पिताजी की मृत्यु के पश्चात् उनकी जलती चिता के समक्ष, उनके अंतर्मन में गहन वैराग्य का उदय हुआ।

उसी क्षण उन्होंने यह संकल्प लिया कि वे इस सत्य की खोज करके रहेंगे कि भौतिक शरीर को चलायमान रखने वाली शक्ति कौन सी है? मैं कौन हैं? कहाँ से आया हूँँ? मृत्य के बाद क्या है? क्या ईश्वर हैं?

इस संकल्प की पूर्ति हेतु उन्होंने कई साधुओं, संत-महात्माओं, तांत्रिक-मान्त्रिक आदि से प्रश्न पूछे व कई धार्मिक पुस्तकें भी पढ़ी पर उन्हें कहीं भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिला।

अन्ततः जगतजननी माँ त्रिपुरसुन्दरी की कृपा से जोधपुर के मेहरानगढ़ किले के पीछे स्थित एक टेकरी पर बने ’माँ’ के मंदिर में उन्हें अदभुत शांति मिली और उन्होंने समर्पित भाव से ’माँ’ की एकनिष्ठ आराधना आरम्भ की। वे बच्चे बनकर रात-दिन निःस्वार्थ प्रेम, व्याकुलता व विरह से ’माँ’ को पुकारने लगे। उनकी सच्ची पुकार सुनकर ’माँ’ स्वयं को रोक नहीं सकीं और उन्हें साक्षात दर्शन देकर उन्हें अपना लाडला पुत्र स्वीकार कर लिया।

जगतजननी माँ के चरणों में आजीवन समर्पित, निष्काम कर्मयोगी, स्थितप्रज्ञ सिद्धपुरुष युगप्रवर्तक भैया श्री नन्दकिशोर जी शारदा ने आज के युग के अनुरूप भौतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों की आवश्यकतानुसार नई विचारधारा, नई पद्धति, नया ज्ञान दिया। उन्होंने इस युग में नई चेतना का सूत्रपात कर उसे जागृत किया और वसुधैव कुटुंबकम, विश्व-बंधुत्व, विश्व-शांति एवं मानव कल्याण की भावना को नवजीवन प्रदान कर विवेकानंद जयंती के शुभ दिन, 24 जनवरी 2003 को वे चैतन्यस्वरुप हो गये। धरती माँ धन्य हुई ऐसे लाड़ले को पाकर!

वात्सल्यमयी माँ बसन्ती मनिहार

वात्सल्यमयी माँ बसन्ती जी मनिहार

सुश्री बसन्ती जी मनिहार (एम.ए., बी.एड.) का जन्म 28 सितम्बर 1942 को जोधपुर में एक अत्यन्त सम्माननीय, सम्भ्रांत एवं सुसंस्कृत परिवार में हुआ। अपने फुफेरे भाई नन्दकिशोर भैया के ज्ञान, साधना और दिव्य व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्होंने समस्त सुख सुविधायें त्यागकर भैया जी के मार्गदर्शन में सन् 1964 से मनिहार भवन के एक छोटे से 6' * 7’ के कमरे में माँ त्रिपुरसुन्दरी की साधना प्रारम्भ की। उनके पिताजी ने उनकी व उनके मार्गदर्शक भैया जी की कई कठिन आध्यात्मिक परीक्षाएं लेकर उन्हें अध्यात्म में जाने की आज्ञा दी थी।

भैया जी के पथप्रदर्शन में उन्होंने पूर्ण समर्पण, बालिकावत् निष्काम प्रेम से निरंतर जप, तप एवं कठोर साधना द्वारा जगतजननी माँ त्रिपुरसुन्दरी की असीम कृपा, वात्सल्य एवं दिव्य दर्शन प्राप्त किये। जगतजननी माँ ने भी उन्हें अपनी लाडली पुत्री के रुप में स्वीकार किया।

भैया जी के चैतन्यस्वरूप होने के पश्चात् उन्होंने उनके समस्त आध्यात्मिक एवं सेवा कार्यों का सफल नेतृत्व किया (2003 - 2021)। उनके मार्गदर्शन में ’मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ सहित अनेक आध्यात्मिक ग्रंथ प्रकाशित हुए तथा शिक्षा, संस्कार, महिला सशक्तिकरण, छात्रवृत्ति, निःशुल्क सद्साहित्य प्रकाशन, खाद्यान्न वितीरण एवं मानव सेवा के विविध प्रकल्पों का विस्तार हुआ।

भैया जी के गूढ़ एवं शाश्वत ज्ञान को उन्होंने सरल, व्यावहारिक एवं जनसुलभ बनाकर असंख्य जिज्ञासुओं तक पहुँचाया तथा ’मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ को अपने वात्सल्य की छांव में आध्यात्मिक जागरण का सशक्त माध्यम बनाया।

7 मई 2021 को वात्सल्यमयी माँ बसन्ती जी मनिहार चैतन्यस्वरुप हो गये। उनका संपूर्ण जीवन प्रेम, समर्पण, वात्सल्य, निष्काम सेवा एवं अध्यात्म का जीवंत आदर्श रहा, जो आज भी अनगिनत साधकों के लिए प्रेरणास्रोत है।

माँ बसन्ती जी के समर्पित जीवन को जानें
करुणामयी माँ मधुबाला अडवानी (मधु माँ)

करुणामयी माँ मधुबाला जी अडवानी

सुश्री मधुबाला जी अडवानी (एम.ए., बी.एड.) का जन्म सन् 1951 में पंजाब के सिरसा शहर में एक आधुनिक विचारों वाले परिवार में हुआ। आरम्भ से ही उनका व्यक्तित्व स्वतंत्र चिंतन, तार्किक दृष्टि, निर्भीकता, दृढ़ संकल्प के साथ-साथ सत्यनिष्ठा, विनम्रता आदि संस्कारों से निर्मित था। भैया जी एवं माँ बसन्ती जी के सच्चे आध्यात्मिक रूप से उनका अन्तर्मन प्रभावित होते हुए भी उन्होेंने अपने अनुभव को तर्क की कसौटी पर परखने के लिए मनोविज्ञान में एम.ए. में प्रवेश लिया। अंततः उनके विवेक ने उनकी आस्था को दृढ़ आधार दिया और उन्होंने सन् 1970 में भैया जी एवं माँ बसन्ती जी के स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन में आध्यात्मिक मार्ग को पूर्ण समर्पण भाव से स्वीकार किया।

उन्होंने भैया प्रदत्त शाश्वत ज्ञान को आत्मसात किया और पाँच दशकों से अधिक समय तक निरन्तर चिंतन, साधना, जप, तप और सेवा के माध्यम से गहन आध्यात्मिक अनुभूतियाँ और महान चैतन्य शक्तियों के आशीर्वाद प्राप्त किये।

भैया जी के दिव्य ज्ञान को कालजयी ग्रन्थ ‘मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ के रूप में लिपिबद्ध करने का महत्वपूर्ण दायित्व भी उन्होंने निभाया। सन् 2021 में माँ बसन्ती मनिहार के चैतन्यस्वरूप होने के पश्चात् उन्होंने ’मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ का नेतृत्व कुशलतापूर्वक संभाला।

आज उनके मार्गदर्शन में यह अध्यात्म परिवार ’बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति’ के प्रचार-प्रसार के साथ शिक्षा, संस्कार, छात्रवृत्ति, महिला सशक्तिकरण, सद्साहित्य, योग और मानव सेवा के विविध प्रकल्पों के माध्यम से विश्व-बन्धुत्व, विश्व-शान्ति एवं मानव कल्याण के उद्देश्य को आगे बढ़ा रहा है। मधु माँ का सरल, विनम्र और निष्काम सेवामय जीवन इस आध्यात्मिक परम्परा का सजीव संवाहक और असंख्य जिज्ञासुओं के लिए प्रेरणास्रोत है।

मधु माँ की सेवा-साधना की यात्रा पढ़ें
दिव्य पुस्तक

'मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार'

‘मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ पुस्तक का आवरण
जीवन, मृत्यु और चैतन्यता के शाश्वत रहस्यों का दिव्य उद्घाटन

भैया श्री नन्दकिशोर शारदा की वह कालजयी एवं मौलिक कृति, जिसमें उन्होंने जगतजननी माँ त्रिपुरसुन्दरी से प्राप्त शाश्वत दिव्य ज्ञान को मानवता के कल्याण हेतु लिपिबद्ध कराया — ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, दिव्य लोक, ब्रह्मकण, भौतिक एवं चैतन्य शरीर, ईश्वर की सत्ता और मृत्यु के पश्चात् की अवस्था जैसे गूढ़ विषयों का सरल, तार्किक एवं विज्ञान-सम्मत विवेचन।

दिव्य ग्रंथ की विशिष्टता

मौलिक

जगतजननी माँ त्रिपुरसुन्दरी से प्राप्त दिव्य ज्ञान पर आधारित।

वैज्ञानिक आधार

विज्ञान एवं अध्यात्म का संतुलित समन्वय होने से तर्क बुद्धि द्वारा सहज स्वीकारिय।

सरल

गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान एवं जटिल रहस्यों की सरल एवं बोधगम्य व्याख्या।

शाश्वत ज्ञान

जीवन, मृत्यु, आत्मा एवं ब्रह्माण्ड के रहस्यों का आधिकारिक मार्गदर्शक।

यह आपके लिए कैसे उपयोगी है?

गहन प्रश्नों के सटीक उत्तर

जीवन, मृत्यु, आत्मा और ईश्वर से जुड़ी अनादि जिज्ञासाओं का मौलिक समाधान।

सर्व सुलभ

हर धर्म, वर्ग, जाति, आयु और बौद्धिक स्तर के जिज्ञासु के लिए समान रूप से ग्राह्य।

निश्चित रूपान्तरण

निष्पक्ष पठन-चिंतन से अनेक जिज्ञासुओं व नास्तिकों का भी आध्यात्मिक रूपान्तरण हुआ है।

निःशुल्क

मानव समाज के अधिकाधिक लाभ के लिए श्री नन्दकिशोर शारदा ज्ञान गंगा मिशन द्वारा जन-जन तक निःशुल्क पहुँचाया जा रहा है, ताकि अधिकाधिक लोग आनन्द, शांति और खुशी से जीवन जीते हुए अपने मनुष्य जीवन के उद्देश्य को पूर्ण कर सकें।

वर्त्तमान युगानुकूल सरल साधना पद्धति

बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति

बुद्धि-विवेक योग साधना का प्रतीक
आधुनिक युग के लिए शाश्वत ज्ञान पर आधारित जीवन जीने की कला

युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर जी शारदा के अनुसार ईश्वर ने मनुष्य को दो अमूल्य उपहार दिए हैं — बुद्धि और विवेक। जब बुद्धि निर्मल होती है, तब ज्ञान से विवेक जागृत होता है, और जागृत विवेक व्यक्ति के विचार, चरित्र, निर्णय एवं जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता है, तथा भौतिक जीवन जीते हुए भी उसे आनन्द, शान्ति और आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।

यह कैसे विशिष्ट है?

सरल

आज की व्यस्त जीवनशैली में सहज रूप से अपनाई जा सकने वाली व्यावहारिक साधना।

वैज्ञानिक

विज्ञान, तर्क, अनुभव और अध्यात्म का संतुलित समन्वय।

समग्र

ज्ञान, भक्ति, निष्काम कर्म और योग का मार्ग — भौतिक सफलता एवं आत्मिक उन्नति दोनों का आधार।

सार्वभौमिक

जाति, धर्म, आयु, वर्ग और देश की सीमाओं से परे सम्पूर्ण मानवता के लिए समान रूप से प्रासंगिक।

यह आपके लिए कैसे उपयोगी है?

सकारात्मक सोच

आत्मविश्वास, संयम, विवेक एवं सद्गुणों का विकास।

सफल व सार्थक जीवन

बुद्धि निर्मल व विवेक जागृत होकर आनन्दमय जीवन का आधार बनती है।

सामाजिक कल्याण

स्वयं, परिवार, समाज और मानवता के कल्याण का माध्यम बनती है।

व्यक्तिगत मार्गदर्शन

साधक की जिज्ञासा और परिस्थितियों के अनुरूप मणिद्वीप व सिद्धपीठ में मार्गदर्शन।

निष्काम कर्म साधना

तीन दशकों की नि:स्वार्थ सेवा, आँकड़ों के साथ

  • 8,631+विद्यार्थियों को शिक्षा सहयोग
  • ₹6.72 करोड़+छात्रवृत्ति सहायता
  • लगभग 300परिवारों को मासिक सहयोग

सभी आँकड़े 31 मार्च 2026 तक सत्यापित और पंजीकृत लोक-न्यासों के वित्तीय प्रतिवेदनों पर आधारित। पूरे आँकड़े देखें

सेवा के विभिन्न स्वरुप

मिशन के सभी सेवा-प्रकल्प एक ही दीर्घकालीन दृष्टि से निर्देशित हैं — मानव जीवन को संतुलित, मूल्य-आधारित, आत्मनिर्भर, करुणामय और सार्थक बनाना। यह दृष्टि चार पंजीकृत लोक-न्यासों के माध्यम से समाज के विविध आयामों तक पहुँचती है।

इन्हीं चार न्यासों के माध्यम से यह दृष्टि व्यवहार में चार रूप लेती है

छात्रवृत्ति सहयोग से जुड़े विद्यार्थी विद्यालय से उच्च शिक्षा तक

शिक्षा

जरूरतमंद छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति, पुस्तकें और सतत मार्गदर्शन, ताकि आर्थिक अभाव प्रतिभा के मार्ग में बाधा न बने।

₹6.72 करोड़+ छात्रवृत्ति · 1996 से
रविवारीय संस्कार कक्षा में बैठे विद्यार्थी जीवन-मूल्यों का विकास

संस्कार

रविवारीय कक्षाओं में आत्मविश्लेषण, विनम्रता, अनुशासन, कृतज्ञता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास, ताकि विद्यार्थी ज्ञान को जीवन से जोड़ सकें।

रविवार कक्षाएँ · व्यक्तित्व विकास
जरूरतमंद परिवारों के लिए खाद्यान्न सहायता निष्काम सेवा का व्यावहारिक रूप

सत्कर्म

खाद्यान्न सहायता, महिला स्वावलम्बन (सिलाई प्रशिक्षण) और जरूरतमंद परिवारों का सहयोग — गरिमा और आत्मनिर्भरता के साथ।

लगभग 300 परिवार · मासिक
निःशुल्क योग कक्षा में अभ्यास करते सहभागी आत्मिक उन्नति

साधना

निःशुल्क योग-प्राणायाम, ध्यान और दिव्य ज्ञान का स्वाध्याय — आंतरिक शान्ति, सकारात्मक दृष्टि और बुद्धि-विवेक की दिशा में।

योग · ध्यान · स्वाध्याय

सेवा का जीवंत प्रभाव

मणिद्वीप में ईश्वरीय अनुकंपा वास्तविक परिवर्तन के रूप में दृष्टिगोचर होती है | कुछ यात्राएँ, जो समय पर मिले सहयोग से सम्भव हुईं —

“समय पर मिला सहयोग शिक्षा को वह आधार बना देता है, जिस पर भविष्य फिर से खड़ा हो सकता है।”

कक्षा 9 से एम.कॉम. तक शिक्षा सहयोग पूरी कहानी देखें →

“कक्षा 10 में पढ़ाई छूटने की कगार से पीएच.डी. और शिक्षण तक की दूरी तय हो सकती है।”

कक्षा 6 से पीएच.डी. तक शिक्षा सहयोग पूरी कहानी देखें →

“सही मार्गदर्शन अंधकार के क्षण को जीवन के उद्देश्य में बदल सकता है।”

कक्षा 12 के बाद शिक्षा, संस्कार एवं मार्गदर्शन पूरी कहानी देखें →

1996–2026 · ₹6.72 करोड़+ छात्रवृत्ति सहयोग · लगभग 300 परिवारों को मासिक खाद्यान्न सहायता · 30 वर्ष, अटूट। प्रत्येक वर्ष का लेखा-जोखा सार्वजनिक है।

मार्गदर्शन के सूत्र

मार्गदर्शन सिद्धान्त

ये सिद्धान्त छात्रवृत्ति को केवल आर्थिक सहायता नहीं रहने देते, बल्कि उसे शिक्षा, संस्कार, व्यक्तित्व-विकास और पारदर्शी सेवा का माध्यम बनाते हैं।

  • १
    शिक्षा से कोई वंचित न रहे

    अर्थाभाव किसी छात्रा की पढ़ाई में बाधा न बने। शिक्षा-सहयोग उसके शैक्षिक, नैतिक, बौद्धिक, आर्थिक और सामाजिक उत्थान का माध्यम बने।

  • २
    संस्कार के बिना शिक्षा अधूरी रहे

    बालिकाओं में ज्ञान के प्रति समर्पण, गरिमा, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, मानवीय संवेदना और करुणा जैसे गुण विकसित हों।

  • ३
    अधिकार के साथ कर्तव्य का बोध हो

    विद्यार्थी अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें। प्रकृति के संसाधनों पर समान अधिकार के साथ प्रकृति के प्रति प्रेम और आदर की भावना विकसित हो।

  • ४
    विकास सर्वांगीण और संतुलित हो

    मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक पहलुओं का सकारात्मक समन्वय हो, ताकि बालिकाओं का व्यक्तित्व संतुलित और सशक्त रूप से विकसित हो सके।

  • ५
    प्रशासनिक खर्च सदस्य स्वयं वहन करें

    सभी तरह के प्रशासनिक व्यय ट्रस्ट के सदस्य व्यक्तिगत रूप से वहन करते हैं, ताकि ट्रस्ट की सम्पूर्ण आय छात्रवृत्ति में उपयोग हो सके।

  • ६
    निधि सुरक्षित रहे, ब्याज छात्रवृत्ति में जाए

    आर्थिक सहयोग की राशि बैंकों में सावधि जमा के रूप में सुरक्षित रखी जाती है और उससे प्राप्त सम्पूर्ण ब्याज छात्राओं में छात्रवृत्ति के रूप में वितरित किया जाता है।

दिव्य परंपरा एवं निरंतरता

ज्योति से ज्योति का शाश्वत प्रवाह

जोत से जोत जलाते चलो, प्रेम की धारा बहाते चलो….
संसार में हर व्यक्ति है दुःखी, सभी को सन्मार्ग दिखाते चलो…
ईश्वर की ओर सभी को बढ़ाते चलो…
— ‘मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ का प्रेरक मंत्र