वात्सल्यमयी माँ बसन्ती जी मनिहार
सुश्री बसन्ती जी मनिहार (एम.ए., बी.एड.) का जन्म 28 सितम्बर 1942 को जोधपुर में एक अत्यन्त सम्माननीय, सम्भ्रांत एवं सुसंस्कृत परिवार में हुआ। अपने फुफेरे भाई नन्दकिशोर भैया के ज्ञान, साधना और दिव्य व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्होंने समस्त सुख सुविधायें त्यागकर भैया जी के मार्गदर्शन में सन् 1964 से मनिहार भवन के एक छोटे से 6' * 7’ के कमरे में माँ त्रिपुरसुन्दरी की साधना प्रारम्भ की। उनके पिताजी ने उनकी व उनके मार्गदर्शक भैया जी की कई कठिन आध्यात्मिक परीक्षाएं लेकर उन्हें अध्यात्म में जाने की आज्ञा दी थी।
भैया जी के पथप्रदर्शन में उन्होंने पूर्ण समर्पण, बालिकावत् निष्काम प्रेम से निरंतर जप, तप एवं कठोर साधना द्वारा जगतजननी माँ त्रिपुरसुन्दरी की असीम कृपा, वात्सल्य एवं दिव्य दर्शन प्राप्त किये। जगतजननी माँ ने भी उन्हें अपनी लाडली पुत्री के रुप में स्वीकार किया।
भैया जी के चैतन्यस्वरूप होने के पश्चात् उन्होंने उनके समस्त आध्यात्मिक एवं सेवा कार्यों का सफल नेतृत्व किया (2003 - 2021)। उनके मार्गदर्शन में ’मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार’ सहित अनेक आध्यात्मिक ग्रंथ प्रकाशित हुए तथा शिक्षा, संस्कार, महिला सशक्तिकरण, छात्रवृत्ति, निःशुल्क सद्साहित्य प्रकाशन, खाद्यान्न वितीरण एवं मानव सेवा के विविध प्रकल्पों का विस्तार हुआ।
भैया जी के गूढ़ एवं शाश्वत ज्ञान को उन्होंने सरल, व्यावहारिक एवं जनसुलभ बनाकर असंख्य जिज्ञासुओं तक पहुँचाया तथा ’मणिद्वीप अध्यात्म परिवार’ को अपने वात्सल्य की छांव में आध्यात्मिक जागरण का सशक्त माध्यम बनाया।
7 मई 2021 को वात्सल्यमयी माँ बसन्ती जी मनिहार चैतन्यस्वरुप हो गये। उनका संपूर्ण जीवन प्रेम, समर्पण, वात्सल्य, निष्काम सेवा एवं अध्यात्म का जीवंत आदर्श रहा, जो आज भी अनगिनत साधकों के लिए प्रेरणास्रोत है।
माँ बसन्ती जी के समर्पित जीवन को जानें






